
रात के दो बज रहे हैं…
मैहर रेलवे स्टेशन पर बैठा हूँ। सामने से आती ठंडी हवा में अक्टूबर की गुलाबी सर्दी का एहसास है और मन में माँ शारदा की इस पावन नगरी के प्रति एक अनकही श्रद्धा। साथ में ड्राइवर साहब हैं। हम अपने सहकर्मियों की ट्रेन आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कुछ घंटे पहले तक मैं लखनऊ स्थित अपने घर पर था। सुबह परिवार के साथ नवदुर्गा पूजन किया, हवन की पवित्र अग्नि में आहुतियाँ अर्पित कीं और कन्या पूजन के बाद माँ भगवती के चरणों में शीश नवाकर काम पर निकल पड़ा।
मन में संतोष था कि दिन की शुरुआत माँ के आशीर्वाद से हुई है। लेकिन यह नहीं सोचा था कि रात के इस पहर, एक रेलवे स्टेशन पर बैठे-बैठे मन ऐसे सवालों में उलझ जाएगा, जिनका संबंध हमारी आस्था, हमारी परंपराओं और हमारी सांस्कृतिक पहचान से है।
मैहर स्थित कंपनी मुख्यालय में दो दिन बाद पूज्य बागेश्वर धाम सरकार, श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी के सान्निध्य में होने वाले विशाल सनातन संवाद की तैयारियों में अपना योगदान देने आया हूँ। संयोग देखिए, दिनभर सनातन संस्कृति से जुड़े इस आयोजन की तैयारियों में व्यस्त रहने के बाद रात को मन स्वयं उसी संस्कृति के कुछ पहलुओं पर विचार करने लगा।
नवरात्र का पावन समय है। सुबह माँ शक्ति की आराधना की थी। ऐसे में अचानक मन में दो प्रश्न उठे।
पहला प्रश्न—विजयादशमी पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाने की परंपरा आखिर कब और क्यों शुरू हुई?
और दूसरा प्रश्न—माँ शक्ति की आराधना से जुड़ा गरबा और डांडिया आज अनेक स्थानों पर डीजे, फिल्मी गानों और देर रात तक चलने वाली पार्टियों का पर्याय कैसे बन गया?
प्रश्न साधारण थे, लेकिन इनके उत्तर तलाशने की यात्रा ने मन को भीतर तक झकझोर दिया।
क्योंकि बात केवल दो परंपराओं के इतिहास की नहीं थी। बात उस सांस्कृतिक विरासत की थी, जिसे हम हर वर्ष बड़े उत्साह से मनाते तो हैं, लेकिन कहीं न कहीं उसके मूल भाव से दूर होते जा रहे हैं।
1. गरबा: माँ शक्ति की आराधना से फैशन नाइट तक का सफर
नवरात्र आते ही देश के अनेक हिस्सों में रंग-बिरंगे परिधान, सजे हुए पंडाल, ढोल की थाप और गरबा-डांडिया की धूम दिखाई देने लगती है। गुजरात से लेकर दिल्ली, मुंबई और लखनऊ तक, गरबा आज एक बड़े सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुका है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि नृत्य हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। उत्सव मनाना, मिलना-जुलना और सामूहिक आनंद लेना भी हमारी परंपरा का हिस्सा है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हर नृत्य, हर संगीत और हर आयोजन अपने मूल सांस्कृतिक उद्देश्य को भी जीवित रख पा रहा है?
गरबा का इतिहास सदियों पुरानी लोकपरंपराओं और माँ शक्ति की उपासना से जुड़ा है। इसकी जड़ें विशेष रूप से गुजरात की सांस्कृतिक परंपरा में मिलती हैं। कुछ पारंपरिक मान्यताएँ इसके संबंध को द्वारका क्षेत्र में प्रचलित लास्य नृत्य और भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी उषा से भी जोड़ती हैं।
परंपरागत गरबा में एक छिद्रयुक्त मिट्टी के घट के भीतर दीपक प्रज्वलित किया जाता था। इस घट को गर्भदीप कहा जाता है। महिलाएँ और अन्य श्रद्धालु उसके चारों ओर गोलाकार घेरे में ताली बजाते हुए, लोकगीत गाते हुए नृत्य करते थे।
उस दृश्य की कल्पना कीजिए।
बीच में एक दीपक जल रहा है। उसके चारों ओर पूरा समाज एक वृत्त में घूम रहा है। कोई आगे नहीं, कोई पीछे नहीं। सबकी गति एक लय में, सबकी दृष्टि उस प्रकाश की ओर।
वह दीपक केवल मिट्टी के पात्र में जलती लौ नहीं था। उसकी प्रतीकात्मक व्याख्या मानव शरीर में विद्यमान चेतना, जीवन और दिव्य ऊर्जा के रूप में भी की जाती रही है।
मिट्टी का घट शरीर का प्रतीक, भीतर का प्रकाश जीवन का प्रतीक और उसके चारों ओर घूमता वृत्त सृष्टि के चक्र का प्रतीक!
अर्थात् गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि जीवन, सृजन, प्रकृति और मातृशक्ति के प्रति कृतज्ञता की एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है।
नवरात्र में माँ अम्बे की आराधना, पारंपरिक लोकगीत, सामूहिक सहभागिता और भक्ति की भावना इसके केंद्र में हुआ करती थी।
फिर समय बदला। शहरीकरण बढ़ा। आयोजन बड़े हुए। प्रायोजक आए, टिकट बिकने लगे, मंच सजे और संगीत के आधुनिक रूप प्रचलित हुए।
इन परिवर्तनों में अपने आप में कुछ गलत नहीं है। आधुनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना, नए परिधान पहनना या बड़े स्तर पर गरबा आयोजित करना भी संस्कृति के विकास का हिस्सा हो सकता है।
समस्या आधुनिकता नहीं, समस्या तब शुरू होती है जब आधुनिकता के नाम पर मूल उद्देश्य ही पीछे छूट जाए।
जब माँ की स्तुति की जगह केवल फिल्मी गीतों की धुनें रह जाएँ, जब भक्ति की लय की जगह केवल डीजे की आवाज रह जाए, जब सामूहिक साधना का भाव केवल दिखावे और फैशन की प्रतिस्पर्धा में बदल जाए, तब हमें ठहरकर विचार करना चाहिए।
क्या हम माँ भगवती की आराधना करने आए हैं, या केवल एक लोकप्रिय नाइट इवेंट का हिस्सा बनने?
यहाँ किसी की आस्था, पहनावे या नृत्य पर प्रश्नचिह्न लगाना उद्देश्य नहीं है। गरबा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रद्धा और परिस्थिति के अनुसार उससे जुड़ सकता है। लेकिन इतना अवश्य है कि आयोजन की भव्यता से अधिक महत्त्व उसके भाव का है।
गरबा की असली सुंदरता कदमों की गति में नहीं, उन कदमों के पीछे छिपी श्रद्धा में है।
2. विजयादशमी: रावण का पुतला जलाना या अपने भीतर के रावण को पहचानना?
दूसरा प्रश्न विजयादशमी से जुड़ा था।
हर वर्ष दशहरे पर देशभर में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले बनाए जाते हैं। आतिशबाजी होती है, भीड़ जुटती है और अग्निबाण चलाते ही कुछ क्षणों में पुतले धू-धू कर जल उठते हैं।
लोग जय श्रीराम के उद्घोष करते हैं। उत्सव समाप्त होता है और हम अपने घर लौट जाते हैं।
लेकिन स्टेशन पर बैठे हुए मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—
क्या रावण के पुतले को जलाने भर से बुराई पर अच्छाई की विजय हो जाती है?
इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए विजयादशमी के मूल महत्त्व को समझना आवश्यक है।
विजयादशमी सनातन संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो धर्म की अधर्म पर, सत्य की असत्य पर और अच्छाई की बुराई पर विजय का संदेश देता है।
यह पर्व भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराने की स्मृति से जुड़ा है। इसी तिथि का संबंध माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जोड़ा जाता है।
अर्थात् विजयादशमी केवल एक युद्ध में मिली विजय का उत्सव नहीं है। यह धर्म की स्थापना, अन्याय के प्रतिरोध और शक्ति के सदुपयोग का प्रतीक भी है।
इस दिन शस्त्र पूजन की परंपरा हमें याद दिलाती है कि शक्ति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसका प्रयोग धर्म और न्याय की रक्षा के लिए होना चाहिए।
शमी वृक्ष की पूजा तथा पांडवों द्वारा अपने अस्त्र-शस्त्र पुनः प्राप्त करने की परंपरा भी इस पर्व से जुड़ी मान्यताओं का हिस्सा है। कृषि परंपराओं में यह नई फसल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का अवसर भी रहा है।
कितने व्यापक अर्थ समेटे हुए है हमारा यह पर्व!
लेकिन फिर रावण दहन की परंपरा का प्रश्न सामने आता है।
इतिहास और लोक-सांस्कृतिक परंपराओं के उपलब्ध अध्ययनों में रावण के पुतले जलाने की व्यवस्थित परंपरा को प्राचीन वैदिक यज्ञों का अनिवार्य अंग नहीं माना जाता। इसका व्यापक प्रचलन मध्यकाल में रामलीला के मंचन और उसके सार्वजनिक उत्सवों के विस्तार के साथ जुड़ा हुआ समझा जाता है। उत्तर भारत में यह परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय हुई।
हालाँकि, इसकी शुरुआत किसी एक निश्चित वर्ष या एक स्थान से हुई थी, ऐसा निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसके इतिहास को किसी एक व्यक्ति या घटना से जोड़ना उचित नहीं होगा।
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में श्रीराम और रावण के युद्ध तथा रावण वध का वर्णन मिलता है, लेकिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाने का कोई निर्धारित शास्त्रीय विधान इन ग्रंथों में नहीं मिलता।
रामलीला के मंचन को अधिक प्रभावशाली बनाने और बुराई के अंत को जनमानस के सामने दृश्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए पुतला दहन जैसी लोकपरंपराएँ विकसित हुईं और लोकप्रिय होती गईं।
इसमें भी कोई बुराई नहीं है। नाट्य परंपराएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। पुतला दहन लोगों को एक साथ लाता है और बुराई के अंत का संदेश देता है।
लेकिन प्रतीक तभी सार्थक होता है, जब वह अपने पीछे के सिद्धांत को जीवित रखे।
रावण का पुतला जलाने का अर्थ केवल दस सिरों वाली एक विशाल आकृति को अग्नि के हवाले करना नहीं होना चाहिए।
उसका अर्थ होना चाहिए—अपने अहंकार को जलाना, अपने भीतर के लोभ को समाप्त करना, अपनी वाणी से निकलने वाले कटु शब्दों पर नियंत्रण पाना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना और अन्याय के सामने मौन रहने की प्रवृत्ति को त्यागना।
यदि हम हर वर्ष रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर के अहंकार को और बड़ा करते जाते हैं, तो क्या हमने विजयादशमी का संदेश वास्तव में आत्मसात किया?
यदि हम श्रीराम के जयकारे लगाते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में मर्यादा, करुणा और सत्य के लिए स्थान नहीं रखते, तो फिर हमारी विजय किस बात की है?
रावण का वध एक पौराणिक घटना भर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष का भी प्रतीक है।
वह संघर्ष जिसमें विवेक को अहंकार पर, संयम को वासना पर, सत्य को छल पर और कर्तव्य को स्वार्थ पर विजय प्राप्त करनी होती है।
रावण का पुतला जलाना परंपरा है, लेकिन अपने भीतर के रावण को जलाना साधना है।
और शायद विजयादशमी का वास्तविक उद्देश्य इसी साधना की ओर हमें प्रेरित करना है।
3. दोनों परंपराओं में छिपा एक ही संदेश
अब इन दोनों प्रश्नों को एक साथ रखकर देखिए।
एक ओर नवरात्र का गरबा है, जिसकी परंपरा में माँ शक्ति के प्रति श्रद्धा, जीवन के प्रति सम्मान और समाज की सामूहिक चेतना का भाव दिखाई देता है।
दूसरी ओर विजयादशमी है, जो हमें धर्म की रक्षा, आत्मसंयम और बुराई के उन्मूलन की प्रेरणा देती है।
दोनों का केंद्र एक ही है—अपने भीतर के अंधकार को पहचानना और प्रकाश की ओर बढ़ना।
लेकिन कहीं न कहीं हम साधन को ही साध्य मानने लगे हैं।
गरबा में नृत्य को महत्त्व मिल गया, लेकिन कभी-कभी आराधना पीछे छूट जाती है।
दशहरे पर पुतला दहन को महत्त्व मिल गया, लेकिन कभी-कभी आत्ममंथन पीछे छूट जाता है।
नवरात्र में हम माँ से शक्ति माँगते हैं, लेकिन क्या उस शक्ति का उपयोग किसी निर्बल की सहायता के लिए करते हैं?
विजयादशमी पर हम अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं, लेकिन क्या अपने जीवन में गलत का विरोध करने का साहस दिखाते हैं?
माँ दुर्गा की आराधना का अर्थ केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है।
श्रीराम की पूजा का अर्थ केवल जयकारे लगाना नहीं, बल्कि मर्यादा, सत्य, कर्तव्य और करुणा को अपने जीवन में स्थान देना भी है।
सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि वह हमें बाहरी अनुष्ठानों के साथ-साथ आंतरिक परिवर्तन की प्रेरणा भी देती है।
पूजा हमें विनम्र बनाती है। व्रत हमें संयम सिखाता है। हवन हमें पवित्रता और समर्पण की याद दिलाता है। कन्या पूजन हमें नारी शक्ति के सम्मान का संदेश देता है।
इसी प्रकार गरबा हमें सामूहिकता और भक्ति की अनुभूति करा सकता है, जबकि दशहरा हमें अपने दोषों पर विजय पाने का संकल्प दे सकता है।
आवश्यकता इन परंपराओं को छोड़ने की नहीं, बल्कि इनके मूल भाव को समझकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की है।
हमें आधुनिकता और परंपरा के बीच किसी अनावश्यक संघर्ष को खड़ा करने की भी आवश्यकता नहीं है। हम आधुनिक संगीत पर नृत्य कर सकते हैं, बड़े आयोजन कर सकते हैं, आतिशबाजी के स्थान पर पर्यावरण-अनुकूल उत्सव चुन सकते हैं और फिर भी अपनी संस्कृति की आत्मा को सुरक्षित रख सकते हैं।
शर्त केवल इतनी है कि उत्सव में आस्था हो, आनंद में मर्यादा हो और परंपरा में उसके मूल संदेश के लिए स्थान हो।
4. अब लौटते हैं मैहर रेलवे स्टेशन पर…
विचारों का यह सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक लाउडस्पीकर पर ट्रेन के आने की सूचना प्रसारित होने लगी।
स्टेशन की नीरवता टूटी। दूर से आती रेलगाड़ी की आवाज सुनाई देने लगी। मैं अपने विचारों से बाहर आया और सहकर्मियों के स्वागत के लिए उठ खड़ा हुआ।
ट्रेन आ रही है…
लेकिन इस ट्रेन के साथ मन में एक और विचार भी चल रहा था, जो शायद स्टेशन पर बिताए इन कुछ पलों से कहीं आगे तक जाने वाला था।
गरबा और रावण के पुतले के दहन से जुड़ी इन दोनों जानकारियों को आप अपने जीवन में कैसे उतारेंगे, इसकी जिम्मेदारी मैं आप पर ही डालता हूँ।
मैंने तो केवल कुछ प्रश्न उठाए हैं और उनके उत्तर खोजने का प्रयास किया है। अब उन उत्तरों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
अगली बार जब नवरात्र में गरबा खेलने जाएँ, तो कुछ पल माँ अम्बे के उस गर्भदीप को भी याद कीजिए, जिसके चारों ओर घूमती परंपरा जीवन और शक्ति के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति रही है।
नृत्य कीजिए, आनंद लीजिए, उत्सव मनाइए—लेकिन माँ की आराधना और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को भी जीवित रखिए।
और जब विजयादशमी पर रावण का पुतला जलता देखें, तो केवल उस अग्नि की चमक मत देखिए। एक क्षण अपने भीतर भी झाँकिए।
- क्या कोई अहंकार है, जिसे त्यागना है?
- क्या कोई कटुता है, जिसे समाप्त करना है?
- क्या कोई गलत आदत है, जिस पर विजय पानी है?
- क्या कोई अन्याय है, जिसके विरुद्ध आवाज उठानी है?
यदि हर विजयादशमी पर हम अपने भीतर की एक बुराई को कम करने का संकल्प लें, तो शायद कुछ वर्षों में हमारे जीवन में भी एक वास्तविक विजय का उत्सव दिखाई देने लगेगा।
क्योंकि माँ शक्ति की सच्ची आराधना केवल उनके सामने शीश झुकाना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर निर्बल की रक्षा करना, अन्याय का सामना करना और अपने भीतर के अंधकार को मिटाना भी है।
और विजयादशमी की सच्ची विजय केवल रावण के पुतले के जलने में नहीं, बल्कि उस दिन में है जब सत्य हमारे आचरण में, मर्यादा हमारे व्यवहार में और करुणा हमारे हृदय में स्थान बना ले।
आइए, इस बार उत्सव भी मनाएँ और उसके संदेश को जिएँ।
माँ दुर्गा से शक्ति माँगें, श्रीराम से मर्यादा की प्रेरणा लें और अपने जीवन को ऐसा बनाएँ कि बुराई पर अच्छाई की विजय केवल एक दिन का दृश्य नहीं, बल्कि हर दिन का संकल्प बन जाए।
जय माता दी!
जय श्रीराम!

एक उत्तर दें