
रात के ग्यारह बज रहे हैं।
पिछले कई समय से जिंदगी में बहुत दौड़-भाग लगी हुई है। सुबह बहुत जल्दी उठकर भागना, दिनभर काम में उलझे रहना और फिर उसी थकान के साथ दिन का खत्म हो जाना। आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था।
सुबह रास्ते में था, तभी खबर मिली—नाना नहीं रहे।
दुख हुआ… लेकिन फिर दिनभर काम में उलझा रहा।
शायद हम कलाकारों के जाने की खबर भी कुछ इसी तरह सुनते हैं—एक कलाकार था, बहुत कुछ किया और चला गया।
लेकिन नाना पाटेकर के जाने की खबर मेरे लिए शायद इतनी भर नहीं है।
पिछले एक घंटे से बिस्तर पर लेटा हूँ। सोने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन नींद का कहीं नामोनिशान नहीं है। रह-रहकर नाना के बहुत सारे किरदार, उनके संवाद और उनसे जुड़ी न जाने कितनी बातें दिमाग में और दिल में घुलती जा रही हैं।
मेरे बहुत करीबी लोग इस बात से जरूर इत्तेफाक रखेंगे कि मैंने अक्सर अपने आपको, अपने व्यवहार को और अपनी सोच को नाना पाटेकर के किरदारों के बहुत करीब पाया है।
रह-रहकर नाना के चेहरे सामने आ रहे हैं।
कभी क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक…

कभी प्रहार का मेजर चौहान…

कभी तिरंगा का शिवाजीराव वाघले…

कभी यशवंत का यशवंत…

इन किरदारों में एक चीज हमेशा मुझे अपनी ओर खींचती रही—खुद्दारी, बेबाकी और अपने उसूलों के लिए खड़े रहने का साहस।
पिछले तेरह-चौदह साल की नौकरी में मैंने शायद इसी सोच के साथ अपनी जिंदगी काटी है।
गलत चीज को सह नहीं पाता।
गलत बात को स्वीकार नहीं कर पाता।
और गुस्सा ऐसा कि कई बार इस्तीफा अपनी जेब में लेकर चलने वाला आदमी बन गया—सिर्फ इसलिए कि कहीं मुझे लगे कि जो हो रहा है, वह मेरे उसूलों, मेरे आदर्शों, मेरी सोच या मेरी समझ के अनुरूप नहीं है और सामने वाला उसे सही ठंग से समझा भी नहीं पा रहा है, तो उस जगह पर ठहरना मुझे मंजूर नहीं।
शायद मेरे इस किरदार को बनाने में नाना पाटेकर का बहुत बड़ा प्रभाव रहा है।
उनके किरदारों ने हमें सिर्फ अभिनय नहीं दिखाया।
उन्होंने हमें समाज को देखने का नजरिया दिया।
देश को देखने का नजरिया दिया।
खुद को देखने का नजरिया दिया।
और सबसे बढ़कर—अपने आदर्शों और अपने उसूलों पर टिके रहने का साहस दिया।
75 साल की उम्र में नाना ने बहुत कुछ हासिल किया। बहुत कुछ दिया। लेकिन आज उन्हें याद करते हुए एक बात सबसे ज्यादा मन में आती है।
हम आम जिंदगी में, खासकर नौकरी या व्यापार में, पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर, नौकरी की मजबूरियों का हवाला देकर कितनी बार अपने ही उसूलों से समझौता कर लेते हैं।
हम ऐसे व्यवहार को सहते चले जाते हैं, ऐसे वातावरण में रहते चले जाते हैं जहाँ हर दिन भीतर से घुटन होती है।
हम जानते हैं कि कुछ गलत है, फिर भी चुप रहते हैं।
और शायद यहीं नाना के किरदार हमें सबसे बड़ी सीख देते हैं।
अगर कभी जिंदगी में आपको लगे कि आप किसी ऐसे माहौल में फँस गए हैं, जहाँ आपकी आत्मा घुट रही है… जहाँ आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँच रही है… जहाँ आपके उसूलों की कोई कीमत नहीं है—तो नाना की कोई पुरानी फिल्म उठाकर देख लीजिए।
मेरा विश्वास है, आपके भीतर अपने लिए सम्मान की एक चिंगारी जरूर जलेगी।
वही चिंगारी आपको उस परिस्थिति का सामना करने का साहस देगी।
और शायद वही आत्मसम्मान आपको धीरे-धीरे उस स्थिति से बाहर निकालकर एक बेहतर जिंदगी की ओर ले जाएगा।
मेरे लिए नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे।
वो मेरे लिए उन किरदारों का नाम थे, जिन्होंने मुझे कई बार याद दिलाया कि समझौते करके जिंदगी काटी जा सकती है, लेकिन आत्मसम्मान के साथ ही जिंदगी जी जाती है।
नाना,
आप चले गए।
लेकिन आपके किरदार नहीं जाएंगे।
आपके संवाद नहीं जाएंगे।
आपकी बेबाकी नहीं जाएगी।
और हम जैसे न जाने कितने लोग, जो कभी आपके किसी किरदार में अपना अक्स देखते रहे हैं, आपके जाने के बाद भी आपसे अपने उसूलों पर डटे रहने की प्रेरणा लेते रहेंगे।
ईश्वर आपकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
और आपके किरदार मेरे जैसे, और भी न जाने कितने लोगों को आने वाले समय में इसी तरह प्रेरित करते रहें।
इन्हीं भावपूर्ण शब्दों के साथ—
नाना पाटेकर को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
🙏

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