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अलविदा बशीर साहब

कुछ शायर साहित्यिक महफ़िलों तक सीमित रह जाते हैं।
और कुछ ऐसे होते हैं जो पूरे समाज की सामूहिक स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं।

बशीर बद्र साहब उन्हीं चुनिंदा नामों में से एक हैं।

मुशायरों से लेकर मध्यमवर्गीय बैठकखानों तक, कॉलेज की डायरियों से लेकर मोबाइल संदेशों तक, और दिलचस्प बात यह कि भारतीय संसद के सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक — उनके शेर हर जगह सुनाई देते हैं।

जब नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी जैसे वैचारिक रूप से बिल्कुल अलग नेता भी संसद में एक ही शायर को उद्धृत करते हैं, तो यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

इसका अर्थ साफ़ है —
बशीर बद्र साहब किसी एक विचारधारा, वर्ग या भाषाई अभिजात्य समूह के शायर नहीं थे।
वो जनमानस के शायर थे।

एक समय ऐसा था जब उर्दू शायरी बेहद कठिन शब्दों और बौद्धिक विशिष्टता में उलझ कर रह गई थी। आम आदमी उससे जुड़ ही नहीं पाता था।
बशीर साहब ने उस दीवार को तोड़ा।

उन्होंने शायरी को लोगों की रोज़मर्रा की भाषा, भावनाओं और अनुभवों से जोड़ा। उनकी शायरी समझने के लिए शब्दकोश नहीं, संवेदनशील हृदय चाहिए था।

और शायद उनकी महानता सिर्फ़ उनकी शायरी तक सीमित नहीं है।

सन् १९८७ के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया था और उनकी वर्षों की लिखी हुई अप्रकाशित रचनाएँ भी आग में ख़ाक हो गई थीं।
एक शायर के लिए यह सिर्फ़ कागज़ जलना नहीं होता, बल्कि अपनी यादों, भावनाओं और जीवन के हिस्सों को खो देना होता है।

लेकिन इतनी बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी के बाद भी उन्होंने अपनी शायरी में कटुता को स्थायी स्थान नहीं दिया।

आज जब हम हर छोटी-बड़ी बात पर पीड़ित मानसिकता को पहचान बना लेते हैं, हर असहमति को स्थायी दुश्मनी में बदलते देखते हैं, तब बशीर बद्र साहब का जीवन हमें एक बहुत बड़ी सीख देता है —

ज़िंदगी आपको तोड़ सकती है, लेकिन कड़वाहट को अपना स्थायी स्वभाव बना लेना आपकी मजबूरी नहीं है।

शायद इसी वजह से बशीर बद्र साहब सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साझा सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बन चुके हैं।

और उनकी ही लिखी ये पंक्तियाँ शायद इस पूरे भाव को सबसे बेहतर तरीके से व्यक्त करती हैं —

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

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