
उन छोटे छोटे नंगे पैरों से उड़ती धूल अभी भी आँखों में चुभ रही। और बार बार आँखों में उतराता पानी पता नहीं उस धूल की वजह से है या उन मासूम पैरों में चुभते सड़क के कंकड़ की टीस, कह पाना मुश्किल है।
लगभग छत्तीस घण्टे बीत चुके हैं पर अभी भी कल सुबह ऑफिस जाते वक्त का वह दृश्य ऑंखों के सामने से हटने का नाम नहीं ले रहा।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले से आया एक श्रमिक परिवार सुबह अपनी दिहाड़ी पर जा रहा था। पिता के कंधे पर हिचकोले खाता फावड़ा, सर पर बंधे गमछे के एक लटकते छोर से टकराता झूलता जा रहा था।
और कदमों से कदम मिलाती हुई उसकी पत्नी सर पर पल्लू, उसके ऊपर तसला और उसमे रखी खाने की पोटली लादे चली जा रही थी।
उन दोनों के कदमों की छाप पर कदमताल करते, उछलते कूदते दो छोटे बालक दीन दुनिया से बेख़बर अपनी ही मस्ती में नंगे पैर चले जा रहे थे।
और उनसे चंद कदम पीछे चलता हुआ मैं उन चार नन्हे कदमों से उड़ती धूल के ग़ुबार में खोता चला जा रहा था।
बस मन में एक ही सवाल कौंध रहा तबसे। पता नहीं कौन कितना नंगा था वहाँ…
वो नन्हे पैर ???
या हमारा समाज???
विश्वगुरु बनने की होड़ में,
जीडीपी की रेस में,
आईपीएल के शोर में,
बड़े-बड़े शोरूम में सजे जूते-चप्पल,
बम्पर सेल और ऑफर्स के बावजूद भी,
उस पिता की जेब से शायद कुछ ज़्यादा महंगे थे…
और उन नन्हे पैरों से कुछ ज़्यादा दूर।
उन छोटे छोटे नंगे पैरों से उड़ती धूल अभी भी आँखों में चुभ रही।

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