
मेरा ऑफिस गुड़गांव के पॉश इलाके – गोल्फ कोर्स रोड पर है और मैं वहीं पास में एक कमरा किराए पर लेकर रहता हूँ।
चूँकि ऑफिस पास में ही है, तो पैदल ही आना जाना होता है। रास्ते में एक बहुत बड़ा रेजिडेंशियल अपार्टमेंट निर्माणाधीन है, तो सुबह और शाम, दोनों शिफ्ट पर पीले हेलमेट और चमकती हरी सेफ्टी जैकेट पहने सैकड़ों कामगार दिखते हैं।
ज्यादातर यू पी, बिहार, झारखंड, बंगाल के दूर दराज़ के गाँव से आए होते हैं जो अपनी मेहनत की गैंती से किस्मत की रेती और सीमेंट में पसीने की बूँदों को मिलाकर अमीरों के महल बनाते हैं।
अक्सर खाने के बाद थोड़ी देर उसी ओर टहलने निकल जाता हूँ।
पर आज जब टहल रहा था तो फुटपाथ किनारे बैठे एक सज्जन की आवाज़ पर ध्यान चला गया।
हथेली पर कसकर तमाखू में चूना मिलाने में व्यस्त और बटन वाले फ़ोन पर स्पीकर में अपने घर बतिया रहे थे। दूसरी ओर शायद उनकी बेटी थी जो उनको गाँव में कुछ दिन पहले आई बाढ़ के बाद दोबारा मवेशियों के चरागाह को दुरुस्त किए जाने का स्टेटस अपडेट दे रही थी, की किस तरह पिछले तीन दिनों से वह, उनका छोटा भाई, दादी और अम्मा मिलकर दीवार पर दोबारा लिपायी में लगे थे और पड़ोस में किसी के यहाँ पक्की छत बन जाने के बाद बेकार हो चुकी टीन की दो चादरें माँग कर ले आए थे जिसे अब दीवार दुरुस्त होने के बाद ऊपर छवाया जाना था।
और इधर चाचा भी अपनी तमाख़ू के साथ गाँव के काम का ब्योरा किसी एक्सपर्ट मैनेजर की तरह कांफ्रेंस कॉल पर लेते हुए अपनी मल्टी टास्किंग स्किल का ऑन रोड प्रेजेंटेशन दे रहे थे।
आगे थोड़ी दूर पर साईट के एंट्री गेट के पास कुछ लोग कल होने वाली विश्वकर्मा पूजन की तैयारियों में लगे थे।
हाँ कल विश्वकर्मा पूजन है।
भगवान विश्वकर्मा सनातन धर्म में निर्माण एवं सृजन के देवता और देवताओं के दिव्य वास्तुकार माने जाते हैं, जिन्होंने देवताओं के सभी रथों, अस्त्र-शस्त्रों और कई पौराणिक नगरों जैसे श्री कृष्ण की द्वारका, सोने की लंका और पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया।

उन्हें ब्रह्माजी का वंशज और शिल्प शास्त्र के आदि पुरुष वास्तुदेव का पुत्र माना जाता है।
जिनकी आराधना स्वयं श्री राम ने राम सेतु निर्माण से पहले की थी, और आज भी हर कल कारखाने से लेकर, बड़ी बड़ी कंस्ट्रक्शन साइट्स पर, यहाँ तक की खाड़ीदेशों में भी काम कर रहे भारतीय कामगार अपनी साईट पर भगवान विश्वकर्मा को पूजते हैं।
जब छोटे थे, तो पापा के कॉलेज में भगवान विश्वकर्मा का जन्मोत्सव बड़े ही भव्य और उत्साह से होता था।
कॉलेज के ऑडिटोरियम में छात्र थर्मोकोल को काटकर औजारों, कल पुर्जों के डिज़ाइन बनाते थे और उसे चमकीली रंग बिरंगी किरकरी (ग्लिटर) से सजाते थे, बन्दनवार, मंडप, क्रेप रोल की रंगीन लड़ियाँ पूरे ऑडिटोरियम में ऐसे सजती थीं की मानो किसी स्वप्नलोक में आ गए हों, बड़ी बड़ी रंगीन और आकर्षक रंगोली से लेकर पूरे हॉल की साज सज्जा में दो तीन दिन तक लगते थे, और हवन पूजन के बाद प्रसाद वितरण जिसमे, फल, चरणामृत के साथ चिरौंजीलाल के बनाये बूंदी के लड्डू आहा हाह, मतलब मजा ही आ जाता था।
और फिर आगे चलकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई और बाद में नौकरी में हर साल विश्वकर्मा पूजन का सौभाग्य मिलता रहा।
कभी मोबाइल कंक्रीट लैब में, कभी कांट्रैक्टर्स और राजमिस्त्री भाइयों के साथ ऑफिस में तो कभी किसी प्रोजेक्ट साईट पर।
यहाँ तक की कोविड के दौरान हमने ज़ूम कॉल पर वर्चुअल भी विश्वकर्मा पूजन किया, और एक बार तो झाँसी के हमारे कांट्रेक्टर महोदय के घर पर आयोजित अनुष्ठान में शामिल होने का सौभाग्य मिला था।
आजकल लखनऊ स्थित घर पर भी निर्माण कार्य चल रहा। और काम करने वाली लेबर के लिए पापा ने बगल के मकान में रुकने प्रबंध करवा दिया है।
काम होने के बाद हमारा तो मकान तैयार हो जाएगा, पर वह मज़दूर कहीं और, किसी और के सपनों को बुनने में लग जाएगा, पर शायद उसे कभी सपना भी नहीं आयेगा कि ऐसा एक मकान वह कभी अपने लिए बना पाएगा।
बड़ी बड़ी इमारतों, महलों, फ्लाइओवर, मेट्रो बनाने वाली हज़ारों की संख्या में यह पीले हेलमेट और हरी सेफ्टी जैकेट वाली भीड़,
साईट पर धूप, गर्मी, बारिश, सर्दी में जी तोड़ मेहनत करने वाली यह भीड़ अपने आप में शायद भगवान विश्वकर्मा का ही अंश रूप हैं, जो इनके हाथों के कौशल से काग़ज़ पर खींची गई कुछ लकीरों को मिट्टी, पत्थर और सीमेंट के साथ एकरूप होकर नवनिर्माण करते हैं।
और मैं ऐसा सिर्फ़ उनके हाथों की कारीगरी की वजह से नहीं कह रहा, अपितु एक और बात है जो मुझे लगता है उन्हें विश्वकर्मा का अंश बनाती है।
और वह ये कि सोने की लंका से लेकर देवताओं और स्वयं श्री कृष्ण के द्वारका का निर्माण करने वाले भगवान विश्वकर्मा के बारे में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता की उन्होंने कभी अपने लिए ख़ुद कुछ बनाया हो।
ठीक वैसे ही जैसे दिन में महलों को बनाने वाला ख़ुद शाम को किसी टूटी झोपड़ी के दरकते छप्पर को देखता हुआ थकान से चूर नींद की आगोश में इस सोच में सोता है कि कल सुबह फिर किसी के सपने में जान डालनी है।
तो इस विश्वकर्मा जन्मोत्सव पर आइए हम नमन करें उन सभी विश्वकर्मा के अंश को जिनके हाथों की लकीरों के बीच जमा सीमेंट हमारे घर की छत को जोड़े हुए है।

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