
दिनकर जी की यह कालजयी कृति अद्भुत है।
महाभारत पर आधारित यह काव्य रंग भूमि में पांडव व कौरव के बीच प्रतिस्पर्धा के दौरान कर्ण के पदार्पण से शुरू होता प्रथम सर्ग ही आज के दौर में भी एक एक शब्द की सार्थकता लिए हुए है।
फिर चाहे वह आरक्षण हो, ऊंच नीच हो, या किसी कार्य क्षेत्र में दक्षता परीक्षा हो।
और जैसे जैसे यह काव्य आगे बढ़ता है, महाभारत को एक बार फिर से एक नए परिपेक्ष से देखने का अवसर देता है, फिर चाहे वह तृतीय सर्ग में श्री कृष्ण का दुर्योधन से वाद हो या कर्ण कृष्ण की बाती, एक एक शब्द ऐसे पिरोया है जैसे आप किसी अमृत का सोपान कर रहे हों।
और यह रोमांच महाभारत के कुरुक्षेत्र तक पहुंचते पहुंचते चरम पर पहुंचता है।
आप किसी सरकारी नौकरी में हों या कॉरपोरेट जगत के झंझावात में, व्यापार कर रहे हों या बस यूं ही अपनी मंजिल ढूंढ रहे हों, आप खुद को खुद के समक्ष ही पाएंगे।
आपने अगर दिनकर जी की यह कृति अभी तक नही पढ़ी तो आज ही इसे पढ़ें, मेरा विश्वास है कि समाज के दोहरे मापदंड हों या खोखले आदर्श, जीवन में स्वयं का आत्मसम्मान हो या प्राप्त यश का दंभ, सब कुछ देखने समझने को मिलेगा इसमें।
अश्रु भी होंगे, हर्ष भी होगा…
क्रुद्ध भी होंगे, विषाद भी होगा…
और रश्मिरथी सोपान से निश्चित ही आत्मदर्पण होगा।
-वरुण
