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धीरज धरने की अधीरता

यह वाक़या बड़ा ही मज़ेदार रहा।
कल सपनों की नगरी मुंबई से झीलों की नगरी उदयपुर की यात्रा बहुत ही मज़ेदार व् रोमांचक रही।
मेरे साथ में फ्लाइट में रहे सहयात्री शायद यह वाक्य सुनकर त्योरियाँ चढ़ा लेंगे। और कई ने तो कल ही रात को अपने अपने सोशल मीडिया अकाउंट और रिश्तेदारों को इस यात्रा का वृत्तांत ठीक उसी भाव में सुनाया होगा जैसे स्कूल के दिनों में गणित के मास्टर जी का अचानक शनिवार को सरप्राइज टेस्ट लेना।

ख़ैर हुआ यूँ की, कल हमारी फ्लाइट शाम 5:30 बजे उड़नी थी, लेकिन किसी वजह से वह आधे घंटे की देरी यानी 6 बजे बोर्डिंग के लिए तैयार हुई। सभी यात्री जो अपनी मुंबई यात्रा पूरी कर चुके थे और वापस घर पहुँच कर अपनी थकान मिटाना चाह रहे थे, या वे यात्री जो आने वाले वीकेंड पर उदयपुर की हसीन नगरी में अपनी त्योहारी छुट्टियाँ मना कर ख़ुद को तरोताज़ा करना चाह रहे थे सभी फ्लाइट में मुस्कराती हुईं मोहतरमा के अभिवादन के साथ अपनी अपनी सीट पर आ बैठे।

और अपना हवाई जहाज़ भी रनवे की ओर बड़ी ही मुस्तैदी के साथ बढ़ चला।

ज़्यादातर यात्री अपना महँगा कटे सेब वाला बिना तार का ईयर फ़ोन और उससे भी ज़्यादा महँगा आईफ़ोन (जो भले ही ईएमआई पर था) में किसी दरियादिल मित्र के नेटफ़्लिक्स पर लॉगिन करके बढ़िया अंग्रेज़ी वेब सीरीज का आनंद लेने और हवाई यात्रा में अपने आप को उच्च समाज के झंडाबरदार बनाते हुए अपनी हथेली मे गर्व और स्वयंभू सम्मान प्राप्त कर आईफ़ोन की स्क्रीन में डूबने लगे।

खैर मुंबई की चकाचौंध और उदयपुर की झीलों के इस झिलमिल तानेबाने में हिन्दी उपन्यास थामे हम उसी देहाती मग्घे की तरह लग रहे थे जैसे अमिताभ बच्चन साहब नमक हलाल में पग घुँघरू बांधे नाचे थे।

और एयरहोस्टेस साहिबा की जटिल मुस्कान और किताब पर गई नज़र से यह समझते देर ना लगी कि वह भी हमे आगे से हिन्दी उपन्यास पढ़ने के लिए रेलयात्रा सुलभ कराने का इशारा दे गयीं थी।

हाथ में हिन्दी उपन्यास जिसका नाम अंग्रेज़ी स्लैंग पर था, शायद लोगों को किसी विदेशी अंग्रेज़ी नावेल का हिन्दी संस्करण लगा हो, लेकिन यह नावेल नहीं उपन्यास था, और वह भी हमारी तरह ही निरा देहातीछाप।

आमतौर पर देहाती छाप होना लोगों को शर्मिंदगी का व् गाँव का गंवार होने का एहसास दिलाता है।

लेकिन हम ठहरे इलाहाबादी। हमाये यहाँ तो भइया देहाती के रसगुल्ले होते हैं, ग़ज़ब की मिठास और खोया ऐसा मुलायम की आहाहा मुँह में रखते ही गल जाए।
तो देहाती कहलाना या देहाती दिखना हमे कभी नहीं अखरता।

तो रहस्य से पटाक्षेप करते हैं, उपन्यास था नीलोत्पल मृणाल का डार्क हॉर्स।

यह उपन्यास मूलतः दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहकर तैयारी करने वाले गाँव के परीक्षार्थियों पर आधारित है, और बहुत ही सरल सहज लोकभाषा का गमछा ओढ़े यह उपन्यास ऐसा घुसा हमाये दिल ओ दिमाग़ पर की तीन घंटे की यह देरी और फिर आगे की हवाई यात्रा का कोई होश हवास ही ना रहा।

इस दौरान जहां बाक़ी यात्री अधीर हुए जा रहे थे और उनकी अधीरता को साधने का भरसक प्रयास चारों होस्टेस मोहिनी स्वरूपा बनी शीतल जल और सौंदर्यप्रसाधनों से सुसज्जित चेहरे पर मुस्कान लिए हुए अधीर सुर असुर सभी को धैर्य रखने का ढाँढस बँधाने का साहसिक अमृत प्रयास कर रहीं थीं।

टैक्सीवे से रनवे, फिर टेकऑफ़ और हवा में उड़ते हुए जहां सभी यात्री बस इसी चिंता में खोये थे कि कब उदयपुर पहुँचे, और हम जल्दी जल्दी पन्ने पूरे करते हुए नीलोत्पल जी के आदिरचना के अंतिम पड़ाव पर मुखर्जी नगर की गलियों में खोये संतोष को बड़े ही असंतोष भाव से खोजने के प्रयास में थे।
ख़ैर हर उस यात्रा जिसका आरंभ होता है उसका अंत होना निश्चित है।
और हमारी यह मुंबई से उदयपुर की यात्रा भी अब समाप्ति की ओर थी।
टच डाउन करते हुए जहां बाक़ी यात्री अपनी इस यात्रा के सफल होने पर धीरज धरे हुए गेट खुलने का इंतज़ार कर रहें थे, मैं सिर्फ़ इस बात में खोया हुआ था कि आख़िर संतोष के भी सफ़र का अंत हुआ।

तो भइया हमाये सफ़र का अंत तो आपने जान लिया, संतोष के सफ़र का आग़ाज़ से लेकर अंत विस्तार से जानना हो तो भावनाओं, देहाती लहजा और आँखों में अनगिनत पूरे और अधूरे सपनों की इस दुनिया में ज़रूर गोता लगायें।

अगर आपने भी जीवन में कभी कुछ पाने की लालसा रखी है तो 176 पन्नों का यह सफ़र आपको भी जाना पहचाना लगेगा।

इसी उपन्यास की एक लाइन के साथ इस सफ़र को विराम दूँगा

“तय नहीं कर पा रहा था कि वह क्या महसूस करे, गुदगुदी या कंपन। वह इन दोनों का भेद नहीं समझ पा रहा था।”

-वरुण